बिलासपुर में जिला अध्यक्षों की सूची जारी होते ही राजनीतिक हलचल तेज.. देवेंद्र के दम से बेदम हुए सभी गुट…..अटल खेमे को नहीं मिली तरजीह….राजनीतिक उठापटक की चुनौतियों से निपटना होगा सबसे बड़ा चैलेंज….

बिलासपुर- कांग्रेस पार्टी अब अपने संगठन को मजबूत करने और आगामी चुनाव में ताकत दिखाने के लिए सृजन कार्यक्रम चलाकर पूरे प्रदेश में जिला स्तर के पदाधिकारियों की नियुक्ति की गई है।रायपुर के बाद सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बिलासपुर में नियुक्त ग्रामीण और शहर जिला अध्यक्षों के नामों को लेकर चल रही है, इसके साथ ही चर्चा इस पर भी जोरो से की जा रही है कि, अन्य गुटों को पछाड़कर कर दम दिखाने वाले देवेंद्र यादव की रणनीति से पार्टी को आगामी चुनाव में कितना लाभ होगा।कई फाड़ वाली स्थिति से गुजर रही कांग्रेस के लिए क्या नए पदाधिकारियों की नियुक्ति टॉनिक का काम करेगी या फिर बदले की राजनीति के लिए मशहूर बिलासपुर कांग्रेस एक दूसरे को निपटाने की होड में आगे आयेंगे।


बीते शाम कांग्रेस द्वारा जारी जिला अध्यक्षों की सूची में शहर कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष सिद्धांशू मिश्रा तो ग्रामीण जिला अध्यक्ष महेंद्र गंगोत्री को जिम्मेदारी दी गई। जिसके बाद समर्थक नवनियुक्त पदाधिकारी के घर के सामने पहुंचकर उत्सव मनाने लगे।लेकिन इस बीच चर्चा का विषय यह भी बना रहा कि, आठ साल बाद जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद कांग्रेस धरातल पर खोई हुई साख पाने में कितने सफल हो पाएंगे।वहीं कांग्रेसी नेताओं के राजनीतिक चरित्र की चर्चा भी जोरो पर है, जहां परंपरा के रूप में एक दूसरे को निपटाने और अपने गुट के आकाओं को खुश करने का संघर्ष पार्टी के लिए घातक साबित हो जाता है।


छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद सत्ता में रहने के 3 साल बाद ही विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार हुई थी जिसके बाद 15 साल के लंबे वनवास ने कांग्रेस को प्रदेश की सत्ता से बाहर रखा, दूसरी ओर बड़े नेताओं के आपसी मतभेद पार्टी के कार्यकर्ताओं में आकाओं का प्रभाव और पैराशूट नेताओं ने चमचों की फौज खड़ी कर कांग्रेस को तितर बितर करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।2018 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुआ और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के फायरब्रांड अंदाज में सत्ता में वापसी की,इस दौरान न्यायधानी बिलासपुर में 20 साल के तिलस्म को तोड़ते हुए शैलेश पाण्डेय विधायक बने लेकिन अगले पांच साल उन्हें विपक्ष ने नहीं बल्कि अपने पार्टी के नेताओं कोप का भाजन होना पड़ा।राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि, बिलासपुर विधानसभा में कांग्रेस को जितनी मशक्कत से सत्ता हासिल हुई थी उतनी आसानी से सत्ता इनके हाथों से निकल भी गई।आपसी लड़ाई और गुटबाजी की वजह से 5 साल तक विधायक शैलेश पाण्डेय को सरकार रहते हुए भी काम करने का मौका तक नहीं मिला।

हाल ही के कुछ सालों में कांग्रेस के लिए स्थिति और भी खराब हुई है बिलासपुर में पार्टी के पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि के कार्यों और एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप ने माहौल को बद से बदतर बना दिया है, बेलतरा में विधानसभा टिकट बिकने के महापौर के ऑडियो से लेकर जिला अध्यक्ष हूं उठाकर ले जाऊंगा तक के मामलों से कांग्रेस की छीछालेदर को नए पदाधिकारी किस तरह से ठीक कर पाएंगे ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। दूसरी ओर चुनाव में अभी लभभग 3 साल का वक्त बाकी है ऐसे में गुटबाजी से बचकर चमचों को दूर कर सभी के आकाओं को खुश कर चुनाव में जितने की रणनीति पर काम करना पड़ेगा।

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