
शांति मार्च ने दिया भाईचारे का संदेश….. मुस्लिम समाज में मकबूल के नेतृत्व पर उठे सवाल…. खपरागंज हिंसा के बाद प्रशासन की पहल की सराहना…. गिरफ्तारियों में 17 मुस्लिम पक्ष से होने पर निष्पक्ष कार्रवाई को लेकर चर्चा…..
बिलासपुर–खपरागंज में पथराव और हिंसा के बाद शहर में शांति, सामाजिक सद्भाव और आपसी भाईचारा कायम रखने जिला प्रशासन और पुलिस की पहल पर निकाला गया शांति मार्च बिलासपुर की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बन गया। विभिन्न समाजों, समुदायों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों की भागीदारी ने यह संदेश दिया कि हिंसा और तनाव शहर की सामाजिक एकता को कमजोर नहीं कर सकते। हालांकि, शांति मार्च के बाद मुस्लिम समाज के एक वर्ग में पुलिस कार्रवाई, समाज के प्रतिनिधित्व और कुछ लोगों की भूमिका को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।
शांति मार्च में प्रशासन और पुलिस की पहल की शहरवासियों ने सराहना की। लोगों का कहना है कि हालिया तनाव के बीच सभी समाजों को एक मंच पर लाकर शांति का संदेश देना जरूरी था। हालांकि, मार्च में शहर विधायक अमर अग्रवाल, पूर्व विधायक शैलेश पांडे और महापौर पूजा विधानी की गैरमौजूदगी भी राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बनी रही।

कार्रवाई के अनुपात पर सवाल…..
खपरागंज पथराव मामले में पुलिस कार्रवाई के तहत अब तक 24 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। इनमें 17 आरोपी मुस्लिम पक्ष और सात आरोपी दूसरे पक्ष से बताए जा रहे हैं। गिरफ्तारी के इस आंकड़े को लेकर मुस्लिम समाज के एक वर्ग में पुलिस कार्रवाई की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।नाराज लोगों का कहना है कि यदि घटना में दोनों पक्षों की भूमिका की जांच की जा रही है तो कार्रवाई का अनुपात इतना अलग क्यों है? उनका तर्क है कि पुलिस को प्रत्येक आरोपी की भूमिका, उपलब्ध साक्ष्य और घटना में उसकी भागीदारी के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए।

मकबूल की भूमिका पर भी नाराजगी…..
इसी बीच मुस्लिम समाज के एक वर्ग में मकबूल की भूमिका को लेकर भी नाराजगी सामने आने की बात कही जा रही है। आरोप लगाने वाले लोगों का कहना है कि शांति समिति की बैठक में समाज की ओर से पुलिस कार्रवाई से जुड़े सवालों को अपेक्षित मजबूती से नहीं उठाया गया।
नाराज लोगों का कहना है कि समाज का प्रतिनिधित्व करने वाला व्यक्ति केवल शांति और भाईचारे की अपील तक सीमित न रहे, बल्कि समाज के लोगों की ओर से उठ रहे निष्पक्ष जांच और समान कार्रवाई के सवालों को भी प्रशासन के समक्ष मजबूती से रखे।
सोशल मीडिया वीडियो को लेकर भी सवाल…..
मामले में ठाकुर राम सिंह से जुड़े सोशल मीडिया वीडियो को लेकर भी कुछ लोगों ने सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि लगातार वीडियो सामने आने के बावजूद पुलिस ने उसकी भूमिका को लेकर क्या जांच की, यह स्पष्ट नहीं है। उनका कहना है कि यदि वीडियो विवादित घटनाक्रम से जुड़े हैं तो पुलिस को उनकी सत्यता और संदर्भ की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।
सोहेल खान के सरेंडर को लेकर आरोप……
सोहेल खान के पुलिस के समक्ष सरेंडर को लेकर भी मकबूल की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। मुस्लिम समाज के कुछ लोगों का आरोप है कि सोहेल के सरेंडर में मकबूल ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इसे लेकर सवाल उठाया जा रहा है कि यदि ऐसा हुआ तो उनकी भूमिका क्या थी और किस स्तर पर उन्होंने बातचीत की।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में पुलिस या संबंधित पक्ष की आधिकारिक प्रतिक्रिया को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
शांति मार्च से पहले बैठक बनी चर्चा का विषय…..
शांति मार्च से पहले मेमन जमातखाना में हुई कथित बैठक को लेकर भी समाज के भीतर चर्चा है। कुछ लोगों का दावा है कि बैठक में सीमित लोगों को ही बुलाया गया और समाज के कई वरिष्ठ व प्रभावशाली लोगों को इसकी जानकारी नहीं दी गई।नाराज लोगों का कहना है कि शांति जैसे संवेदनशील विषय पर यदि बैठक बुलाई गई थी तो समाज के सभी प्रमुख लोगों को शामिल किया जाना चाहिए था।साथ ही समाज के उलेमाओं से इस संवेदनशील मामले में राय मशवरा किया जाना चाहिए था। ताकि सामूहिक सहमति से रणनीति तय होती। लेकिन मुस्लिम समाज का बड़का नेता बनने के चक्कर में सबको दरकिनार कर इस संवेदनशील मामले को भुनाने में लगा रहा इस कृत्य के चलते ही मकबूल पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि पूरे घटनाक्रम का श्रेय किसी एक व्यक्ति को देने की कोशिश की गई।
नेतृत्व का सवाल भी गरमाया…..
शांति मार्च के दौरान मकबूल की सक्रिय मौजूदगी भी चर्चा में रही। आलोचकों का आरोप है कि वे मार्च में लगातार आगे-पीछे सक्रिय नजर आए और स्वयं को मुस्लिम समाज के प्रमुख चेहरे के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते दिखे। हालांकि, किसी व्यक्ति की पोशाक या मार्च में उसकी स्थिति को नेतृत्व का प्रमाण मानना उचित नहीं है।
समाज के नाराज लोगों का कहना है कि नेतृत्व केवल जुलूस में आगे चलने से नहीं, बल्कि संकट के समय समाज की वास्तविक समस्याओं और सवालों को प्रशासन के सामने मजबूती से रखने से साबित होता है।

प्रशासन की पहल की सराहना, नेताओं की गैरमौजूदगी चर्चा में…..
खपरागंज की घटना के बाद शांति व्यवस्था कायम करने जिला प्रशासन और पुलिस की पहल को शहर में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है। शांति समिति की बैठक के बाद निकाले गए मार्च में विभिन्न समाजों की भागीदारी ने सामाजिक एकता का मजबूत संदेश दिया।
इसके बावजूद शहर विधायक अमर अग्रवाल, पूर्व विधायक शैलेश पांडे और महापौर पूजा विधानी की गैरमौजूदगी चर्चा में रही। लोगों के बीच यह सवाल भी उठता रहा कि शहर में तनावपूर्ण स्थिति के बाद आयोजित इतने महत्वपूर्ण शांति मार्च में प्रमुख जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी क्यों नहीं रही।
फिलहाल प्रशासन की चुनौती शांति व्यवस्था कायम रखने के साथ ही घटना में शामिल प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका की निष्पक्ष जांच करने की है। वहीं, मुस्लिम समाज के भीतर उठ रहे नेतृत्व और पुलिस कार्रवाई से जुड़े सवालों का जवाब भी आने वाले दिनों में पुलिस जांच और संबंधित पक्षों के आधिकारिक पक्ष से स्पष्ट होने की उम्मीद है।



