संस्कृत को कर्मकांड तक सीमित नहीं…. रोजगार और आधुनिक शिक्षा से जोड़ें…. बारहवीं के बाद संस्कृत विद्यार्थियों के सामने उच्च शिक्षा का संकट…. प्रदेश में ही आगे की पढ़ाई के अवसर विकसित करने पर जोर…..

बिलासपुर– संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन की चर्चा अब केवल भाषा बचाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि संस्कृत शिक्षा को आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और रोजगार से जोड़ने की ठोस पहल जरूरी है। संस्कृत विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर भी प्रदेश में पर्याप्त अवसर विकसित करने की जरूरत है। बारहवीं के बाद उच्च शिक्षा के सीमित विकल्पों के कारण कई विद्यार्थियों को दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है और आर्थिक कठिनाइयों के चलते उनकी पढ़ाई बीच में छूट जाती है। यह बात स्वामी परमात्मानंद और पुष्पा दीक्षित ने बिलासपुर प्रेस क्लब में पत्रकारों से चर्चा के दौरान कही।
स्वामी परमात्मानंद ने कहा कि संस्कृत बोर्ड में ऐसे अधिकारियों की आवश्यकता है, जो संस्कृत भाषा और उसकी शिक्षा व्यवस्था को गहराई से समझते हों। प्रदेश में संस्कृत की प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ाने वाले अनेक संस्कृत विद्यालय संचालित हैं। इन संस्थानों को सरकार की ओर से पर्याप्त अनुदान मिलना चाहिए। केवल विद्यालयों के संचालन के लिए ही नहीं, बल्कि शिक्षकों और विद्यार्थियों की आवश्यकताओं के लिए भी सहयोग की व्यवस्था जरूरी है।
उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल अनिवार्य विषय बनाने से इसका उद्देश्य पूरा नहीं होगा। ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिसमें विद्यार्थी स्वयं संस्कृत को अपने अध्ययन का हिस्सा बनाना चाहें। इससे भाषा के प्रति स्वाभाविक रुचि और समाज में इसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि सामान्य सरकारी स्कूलों और पारंपरिक संस्कृत विद्यालयों की समस्याएं अलग हैं, इसलिए दोनों के लिए एक जैसी नीति के बजाय उनकी जरूरतों के अनुरूप अलग दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।

बारहवीं के बाद आगे की राह सीमित…..

स्वामी परमात्मानंद ने संस्कृत विद्यालयों के विद्यार्थियों की सबसे बड़ी समस्या उच्च शिक्षा से जुड़ी बताई। उन्होंने कहा कि उच्चतर माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रदेश में संस्कृत विद्यार्थियों के लिए आगे की शिक्षा के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हैं। इसके कारण विद्यार्थियों को दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। आर्थिक और अन्य व्यावहारिक कठिनाइयों के कारण कई विद्यार्थी आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाते। प्रदेश में ही संस्कृत विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा के पर्याप्त संस्थान और पाठ्यक्रम विकसित किए जाने चाहिए।

संस्कृत के साथ विज्ञान-गणित की पढ़ाई हो……
उन्होंने छत्तीसगढ़ संस्कृत विद्यामंडल की पहल का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्कृत विद्यार्थियों को विज्ञान और गणित से जोड़ने की दिशा में प्रयास हुए हैं। इससे विद्यार्थियों के लिए आगे चलकर अध्ययन और रोजगार के नए क्षेत्र खुल सकते हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि इस दिशा में अभी और व्यापक काम करने की जरूरत है।
स्वामी परमात्मानंद ने कहा कि संस्कृत को केवल धार्मिक कर्मकांड की भाषा मानना इसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना है। यह समृद्ध भाषा है, जिसे आधुनिक शिक्षा, शोध, तकनीक और रोजगार के नए क्षेत्रों से जोड़ा जाना चाहिए। शिक्षा में शास्त्र, कला और कौशल का संतुलित समावेश हो, ताकि विद्यार्थी शिक्षा पूरी करने के बाद आजीविका के अवसर भी तैयार कर सकें।
उन्होंने कहा कि संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने का अभियान केवल सरकारी अनुदान तक सीमित नहीं होना चाहिए। मीडिया, विद्वानों और समाज की सक्रिय भागीदारी से संस्कृत शिक्षा, विद्यालयों की समस्याओं और विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर व्यापक जनचर्चा जरूरी है। संस्कृत के संरक्षण के साथ उसके विद्यार्थियों के भविष्य को सुरक्षित करना भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।

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