जादू-टोना के शक में बर्बरता….. फिर पुलिस की लापरवाही….हाईकोर्ट ने लिया सख्त संज्ञान…..
जादू-टोना के शक में बर्बरता..... फिर पुलिस की लापरवाही....हाईकोर्ट ने लिया सख्त संज्ञान

रायपुर/ रायपुर जिले के अभनपुर थाना क्षेत्र में घटी एक दिल दहला देने वाली घटना अब न्याय के बड़े मंच तक पहुंच चुकी है। यह सिर्फ एक परिवार पर अत्याचार की कहानी नहीं, बल्कि भीड़ की अंधविश्वास भरी हिंसा और सिस्टम की कथित नाकामी की गंभीर तस्वीर भी पेश करती है।
अंधविश्वास बना हैवानियत की वजह…
13 मार्च 2025 की वह तारीख, जब एक साधारण दिन अचानक भय और क्रूरता में बदल गया। गांव के कुछ लोगों ने (A) पर काला जादू करने का आरोप लगाया। देखते ही देखते आरोपों ने उग्र रूप ले लिया और भीड़ ने (A) के साथ मारपीट शुरू कर दी।
जब उनके पिता (B) और भाई (C) उन्हें बचाने पहुंचे, तो भीड़ का गुस्सा उन पर भी टूट पड़ा। तीनों को बुरी तरह पीटा गया। इतना ही नहीं, इंसानियत को शर्मसार करते हुए उन्हें अर्धनग्न कर पूरे गांव में घुमाया गया, चेहरे पर कालिख पोती गई और जूतों की माला पहनाकर अपमानित किया गया।

रात भर तीनों को गांव के चौराहे पर बंधक बनाकर रखा गया—जहां वे दर्द, अपमान और भय के बीच पूरी रात गुजारने को मजबूर रहे।
मदद की पुकार और पुलिस पर आरोप….
घटना की सूचना डायल-112 पर दी गई, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची। लेकिन पीड़ितों का आरोप है कि पुलिस ने उनकी मदद करने के बजाय उनसे जबरन एक कागज पर हस्ताक्षर कराए, जिसमें शिकायत न करने की बात लिखी थी। इसके बाद उन्हें गांव के बाहर छोड़ दिया गया।
न्याय के लिए दर-दर भटकते पीड़ित….
जब पुलिस ने उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की, तो पीड़ितों ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए आरोपियों के खिलाफ छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005 सहित अन्य धाराओं में केस दर्ज कर चालान पेश करने का आदेश दिया।
लेकिन यहां भी पीड़ितों को निराशा हाथ लगी। पुलिस ने 21 आरोपियों के खिलाफ केवल जमानती धाराओं में मामला दर्ज किया, जिससे पीड़ित पक्ष ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
हाईकोर्ट की सख्ती…..
मामला जब हाईकोर्ट पहुंचा, तो चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इसे बेहद गंभीर माना। अदालत ने इसे भीड़ हिंसा (मॉब लिंचिंग) से जुड़ा मामला बताते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई।
पिछली सुनवाई में डीजीपी ने शपथपत्र में स्वीकार किया कि मामले में पुलिस स्तर पर चूक की आशंका है, जिसके बाद विभागीय जांच शुरू की गई।
जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई….
मामले में तत्कालीन थाना प्रभारी इंस्पेक्टर सिद्धेश्वर प्रताप सिंह और सब-इंस्पेक्टर नरसिंह साहू के खिलाफ विभागीय जांच के आदेश दिए गए हैं और उन्हें चार्जशीट भी जारी की गई है।
डिवीजन बेंच ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि डीजीपी विभागीय जांच की रिपोर्ट शपथपत्र के साथ पेश करें। साथ ही, अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ट्रायल कोर्ट में अपने सभी साक्ष्य और शिकायतें रखने के लिए स्वतंत्र हैं।
अगली सुनवाई तय….
हाईकोर्ट ने याचिका का आंशिक निपटारा करते हुए पुलिस अधिकारियों के आचरण से जुड़े पहलू को लंबित रखा है। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में, जहां सार्वजनिक अपमान, भीड़ हिंसा और पुलिस की लापरवाही जैसे गंभीर आरोप हों, वहां न्यायिक निगरानी बेहद जरूरी है।
मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
यह घटना एक बार फिर समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है, जहां अंधविश्वास इंसानियत पर भारी पड़ जाता है, और न्याय पाने के लिए पीड़ितों को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है।




